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एक भोले किसान की अटपटी इच्छा
एक गाँव में एक किसान रहता था। वह बिल्कुल अनपढ़ और भोला-भाला इन्सान था। उसने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा था, पर उसके मन में पढ़ाई को लेकर एक अजीब समझ थी। वह अक्सर गाँव के पढ़े-लिखे लोगों को चश्मा लगाकर अखबार या किताबें पढ़ते देखता था।
उसने सोचा, "अरे वाह! तो यह राज़ इन चश्मों में छुपा है! इनकी वजह से ही तो ये लोग पढ़-लिख पाते हैं। अगर मेरे पास भी ऐसा एक चश्मा होता, तो मैं भी बड़े-बड़े अक्षर पढ़ सकता।" यह सोचकर उसने तय किया कि उसे अगले ही दिन शहर जाकर अपने लिए एक चश्मा खरीद लाना चाहिए।
चश्मे की दुकान में मजेदार मुलाकात
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अगले दिन वह किसान शहर पहुँचा और सीधा एक चश्मे की दुकान में गया। दुकानदार से उसने कहा, "भाई साहब, मुझे पढ़ने के लिए एक अच्छा सा चश्मा चाहिए।"
दुकानदार ने समझा कि शायद उसकी नज़र कमज़ोर है। उसने तरह-तरह के चश्मे ट्रे से निकालकर किसान को दिखाने शुरू किए। किसान को एक किताब भी थमाई गई। किसान ने उत्साह से एक के बाद एक चश्मे आँखों पर लगाए, किताब की तरफ देखा, और माथा पकड़ लिया। उसे एक भी शब्द नहीं दिख रहा था! वह बोला, "ये सारे चश्मे बेकार हैं! इनसे तो मैं कुछ भी पढ़ नहीं पा रहा हूँ।"
दुकानदार ने देखा राज और खुली पोल
दुकानदार को बड़ी हैरानी हुई। उसने गौर से देखा तो पाया कि किताब उल्टी पड़ी थी और किसान उसी उल्टी किताब को पढ़ने की कोशिश कर रहा था! दुकानदार ने पूछा, "क्या तुम्हें पढ़ना नहीं आता?"
किसान ने भोलेपन से जवाब दिया, "नहीं भाई साहब, मुझे पढ़ना तो नहीं आता। इसीलिए तो मैं चश्मा लेने आया हूँ! मैंने सोचा चश्मा लगाते ही पढ़ना आ जाएगा। पर ये तो काम ही नहीं कर रहे।"
दुकानदार के लिए अपनी हँसी रोक पाना मुश्किल हो गया। उसने मन ही मन सोचा कि यह कितनी बड़ी भोली-भाली अज्ञानता है।
Wikipedia Reference (साक्षरता के बारे में):
साक्षरता का अर्थ सिर्फ अक्षर जोड़ना नहीं है, बल्कि समाज में कार्यात्मक रूप से भाग लेने की क्षमता है। साक्षरता व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास और राष्ट्र की प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में साक्षरता दर में निरंतर सुधार हो रहा है, जिसमें शिक्षा के अधिकार अधिनियम जैसे कदमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
दुकानदार की समझदारी और मिली सीख
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दुकानदार ने धैर्य से समझाया, "मेरे भोले दोस्त, चश्मा सिर्फ आँखों की रोशनी ठीक करता है, ताकि छपे हुए अक्षर साफ दिखें। यह तुम्हें पढ़ना नहीं सिखा सकता। पढ़ना एक कला है, जो सीखनी पड़ती है। पहले तुम किसी स्कूल में जाकर पढ़ना-लिखना सीखो। फिर देखना, बिना चश्मे के भी तुम किताब पढ़ सकोगे।"
किसान की आँखें खुल गईं। उसे अपनी गलतफहमी का एहसास हुआ। उसने दुकानदार को धन्यवाद दिया और वादा किया कि वह अब पहले पढ़ना सीखेगा, बाद में अगर जरूरत पड़ी तो चश्मा लेगा।
कहानी की सीख:
उपकरण और साधन ज्ञान नहीं देते। चश्मा, किताब या कम्प्यूटर सिर्फ साधन हैं, ज्ञान तो मेहनत और सीखने से मिलता है। अज्ञानता ही सबसे बड़ा अंधकार है, और शिक्षा ही उसे दूर करने की एकमात्र कुंजी है। बिना मेहनत के शॉर्टकट ढूँढना हमें मूर्ख ही बनाता है।
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